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Language: Hindi
Umm Salamah (RA) narrated that: When the Prophet (ﷺ) would leave his house, he would say:
بِسْمِ اللَّهِ تَوَكَّلْتُ عَلَى اللَّهِ اَللَّـهُمَّ إِنَّا نَعُوذُ بِكَ مِنْ أَنْ نَزِلَّ أَوْ نَضِلَّ أَوْ نَظْلِمَ أَوْ نُظْلَمَ أَوْ نَجْهَلَ أَوْ يُجْهَلَ عَلَيْنَا
बिस्मिल्लाहि, तवक्कल्तु 'अलल-लाहि। अल्लाहुम्मा, इन्ना न'ऊज़ु बिका मिन अन नज़िल्ला औ नज़िल्ला, औ नज़लिमा औ नुज़लामा, औ नज़हला औ युज़हला 'अलैना
अल्लाह के नाम से, मैं अल्लाह पर भरोसा करता हूँ। ए अल्लाह! हम तेरी पनाह मांगते हैं अनजाने में फिसलने या गुमराह होने, या जुल्म करने या जुल्म सहने, या अज्ञानता से काम करने या अज्ञानता से व्यवहार किए जाने से। एक मोमिन को जब भी (दिन/रात) वह बाहर जाता है तो उसे इन अज़कार को अपने दिल से पढ़ना चाहिए।
Reference: सहीह (अल्बानी)। तिर्मिज़ी: ३४२૭