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Language: Hindi
रसूलुल्लाह (ﷺ) नमाज़ के अंत में तशहहुद और सलाम के बीच ये शब्द कहते थे:
اَللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ وَمَا أَخَّرْتُ وَمَا أَسْرَرْتُ وَمَا أَعْلَنْتُ وَمَا أَسْرَفْتُ وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي أَنْتَ الْمُقَدِّمُ وَأَنْتَ الْمُؤَخِّرُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ
अल्लाहुम-मग्फिर ली मा कद्दम्तु, व मा 'अख्खर्तु, व मा 'असरर्तु, व मा 'अ'लन्तु, व मा 'असरफ्तु, व मा 'अन्त 'अ'लमु बिही मिन्नी। 'अन्तल-मुकद्दिमु, व 'अन्तल-मुअख्खिरु ला 'इलाहा 'इल्ला 'अन्त
ए अल्लाह, मुझे माफ कर दे जो मैंने पहले भेजा और जो मैंने पीछे छोड़ा, जो मैंने छुपाया और जो मैंने ज़ाहिर किया, जो मैंने ज़्यादती की, और जिसके बारे में तू मुझसे बेहतर जानता है। तू ही आगे बढ़ाने वाला है और तू ही पीछे करने वाला है। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक नहीं। तशहहुद के बाद, अल्लाह के रसूल (ﷺ) सलाम कहने से पहले, अंत में यह दुआ मांगते थे।
Reference: मुस्लिम: ૭૭१