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Language: Hindi
अल्लाह के रसूल (ﷺ) वित्र प्रार्थना के अंत में कहते थे:
اَللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوْذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقُوبَتِكَ، وَأَعُــوذُ بِكَ مِنْكَ، لَا أُحْصِيْ ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ
अल्लाहुम्मा 'इन्नी 'अ'ऊज़ु बिरिज़ाका मिन सखतिक, व बिमु'आफ़ातिका मिन 'उकू-बतिक व 'अ'ऊज़ु बिका मिन्का, ला 'उहसी सना'अन 'अलैका 'अन्ता कामा 'अस्नैता 'अला नफ़्सिक
ए अल्लाह, मैं तेरे गुस्से से तेरी रज़ा की पनाह मांगता हूं। मैं तेरी सज़ा से तेरी माफ़ी की पनाह मांगता हूं। मैं तुझसे तेरी पनाह मांगता हूं। मैं तेरी तारीफ नहीं गिन सकता, तू वैसा ही है जैसा तूने खुद की तारीफ की है।
Reference: सहीह. अबू दाऊद: १४२७