Loading...
Language: Hindi
رَبِّ لَوْ شِئْتَ أَهْلَكْتَهُم مِّن قَبْلُ وَإِيَّايَ ۖ أَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ السُّفَهَاءُ مِنَّا ۖ إِنْ هِيَ إِلَّا فِتْنَتُكَ تُضِلُّ بِهَا مَن تَشَاءُ وَتَهْدِي مَن تَشَاءُ ۖ أَنتَ وَلِيُّنَا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۖ وَأَنتَ خَيْرُ الْغَافِرِينَ ﴿١٥٥﴾ وَاكْتُبْ لَنَا فِي هَـٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ إِنَّا هُدْنَا إِلَيْكَ ۚ ﴿١٥٦﴾
रब्बी लौ शिता अह्लकताहुम मिन कबलु व इय्याय...
(१५५) ऐ मेरे रब, अगर तू चाहता तो पहले ही उन्हें और मुझे हलाक कर देता। क्या तू हमें उसके लिए हलाक करेगा जो हममें से बेवकूफों ने किया? यह तो बस तेरी एक आज़माइश है जिससे तू जिसे चाहता है गुमराह करता है और जिसे चाहता है हिदायत देता है। तू हमारा वली (मददगार) है, तो हमें माफ कर दे और हम पर रहम कर; और तू सबसे बेहतर माफ करने वाला है। (१५६) और हमारे लिए इस दुनिया में भलाई लिख दे और आख़िरत में भी; बेशक हम तेरी तरफ रुजू हुए।
Reference: सूरा अल-अराफ़ ૭:१५५-१५६